शुक्रवार, 18 जुलाई 2008

भ्रूण - हत्या मीडिया से लेकर जाति, धर्म तक को होना होगा जागरूक

इतनें बडे प्रचार और प्रसार के बाद भी आज स्थिति जस की तस अर्थात मीडिया से लेकर समाज सेवी तक के वे सरे प्रयास विफल होते जा रहे हैं , जो अब तक भ्रूण हत्या और गर्भपात के सम्बन्ध में किए जाते रहे हैं । पर विडंबना की बात तो यह है की जिन पढे लिखे लोगों पर ये जिम्मेदारियों सौंपी जाती हैं वे ही ऐसे आपराधिक मामलों में ऐक्षिक रूप से सक्रिय हैं । और मानवीयता से ऊपर उठकर ऐसे अमानवीय कुकृत्य को अंजाम दे रहे हैं । बताइए, जब शिक्षा देनें वाले ही इस तरंह अपनें कर्तव्यों को अपराधों के साये में पलते देखे जायेंगे तो उनका अनुसरण करनें वाले भला अपने आप को कैसे दूर रख सकते हैं ?

अभी हाल ही के दिनों में नवांशहर में एक नर्स को रंगे हांथों तब पकड़ा गया जब वह एक औरत का गर्भपात करनें में संलग्न थी । ये कहना कोई गलत ना होगा की ऐसे मामलों में जहाँ परिवार के सदस्यों की भूमिका होती है वहीँ पर ऐसे नर्सों और डाक्टरों द्वारा भी बडे ही शौक से इस भूमिका को अदा किया जाता है । जबकि देश और प्रदेश के अनपढ़ और कम समझदार जनता को समझानें के लिए इन्हीं को वहां पर भेंजा जाता है। और भला इनकी बातों को मानेगा भी कौन ? दूसरों को नसीहत ख़ुद मियाँ फजीहत । परिणामतः दिनों दिन स्थिति और भी बदतर होती जा रही है और यदि इन पर मीडिया और सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों द्वारा कुछ हट क्र कुछ ना किया गया तो शायद भविष्य में परिस्थिति और भी जटिल और स्थिति और भी दयनीय हो सकती है ।

लेकिन हमें सिर्फ़ सत्ताधारी पार्टियों और मीडिया पर ही नहीं निर्भर रहना चाहिए क्योंकि किसी बुराई को ख़त्म करनें के लिए एक ही दरवाजे की कीवाड़ मजबूत करना ठीक नहीं होगा । हमें तो हर उस दीवार को मजबूत करना होगा जो समाज की महल के विनाश और विकास में मत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं । अर्थात इन सबके साथ साथ हमें अपनें धार्मिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक और पारंपरिक स्थितियों को भी सुदृढ़ करना होगा । यहाँ पर ये बात कुछ अटपटी जरूर लग सकती है की भला इन सबके साथ क्या सम्बन्ध है भ्रूण - हत्या और गर्भपात का जिससे ये नियंत्रण में लिए जा सकेंगे । इतिहाश गवाह है की अभी तक चाहे सती प्रथा हो या बाल विवाह इन सबको भी तो परम्पराओं और धर्मों से जोडकर ख़तम किया गया । जिसके चलते नयी परम्पराएँ स्तित्व में आयीं और उनका भी पालन किया जा रहा है ।

वास्तव में आज यह एक जटिल समस्या हो गयी है जिससे निपटानें के लिए जन बच्चा से लेकर बूढों जवान और औरतों तक को निःसंकोच आगे आना होगा । इसमें धर्म के चलते वैसे आदमियों या स्त्रियों को मंदिरों या मस्जिदों में जानें से रोका जा सकता है । समाज से बाहर किया जा सकता है । आख़िर जब गलत कार्यों के लिए धर्मों और जातियों को साधा जा सकता है तो भला ऐसे कार्य के लिए इनकी सहायता क्यों नहीं ली जा सकती ।

2 टिप्‍पणियां:

Mired Mirage ने कहा…

विष को विष से काटने का विचार अच्छा है परन्तु इससे धर्म की पकड़ और मजबूत हो जाएगी।
घुघूती बासूती

उमेश कुमार ने कहा…

dear anil kumar you know that i have reached Bhopal. I have no any way to contact you. so I am contecting you on your blog.