शनिवार, 11 अक्तूबर 2008

अच्छा तो हमें नशीब नहीं बुरा ही बस बनते चलो ...


दोस्त तुम घटे चलो यार तुम मिटे चलो


अयोग्यता का प्रचार हो विद्वता का संघार हो


ना आएगी कुसमय कभी ये न होगी दुर्दशा कभी ये


निर्माण से विनाश पथ पर ऐ यार तुम डटे चलो ॥




संसार है पलट रहा हर द्वार है उलट रहा


पहले जहा तरु-पत्तियां , अब धूल ही उचट रहा


क्या पेड़ तुम लगाओगे , व्यर्थ समय यूँ गवाओगे


जो तालाब हैं कुवा खुदे , उन्हें भी बस पटे चलो ॥




कटे चलो परिवार से आचार से व्यवहार से


ना पित्रि से ना मात से सम्बन्ध हो बस स्वार्थ से


बनाए जो पूर्वज , सभी मिटाओ तुम अभी अभी


है सभ्यता तो पश्चिमी ना भारतीयता लखो ॥




उठो उठो उठो सभी हुंकार लो अंधकार हो


किसी तरंह कलयुग का अभी अभी उद्धार हो


जहाँ को है भूनना उठा लो तुम हथियार को


मनुजता को ना सोचो बस पशुता पर अड़े चलो ॥




बढ़े चलो बढ़े चलो विनाश दूर अब नहीं


शीलता और दीनता तो जिन्दा ही नहीं कहीं


कहीं कहीं जो थोड़ी सी इमान है बची अभी


उसे भी क्रूर अशिष्टता से दमित तुम करते चलो ॥




चलो चलो चलो चलो , जागो , सभी चलते चलो


कतराए जो चलनें से यूँ , उसे भी कुचलते चलो


क्या पता कब तक रहो , मृत्यु आज ना कि कल ही हो


अच्छा तो हमें नशीब नहीं बुरा ही बस बनते चलो ...........................,, ॥

1 टिप्पणी:

उमेश कुमार ने कहा…

kya baat hai bhai sahab bahut hi udas lg rhe ho. aisi kamana kyon kr rhe ho. are mana ki duniya men bahaw aaya hai lekin ham kya karne ke liye paida hua haio. sabhi ko sudharne se theek hai ki ham khud hi sudhare aur apne achchar vichar ke apnaye. bharat ki sanskriti bahut hi purani hai itnai jaldi nhi mit jayegi.

andhakar se kyon ghabraye,
achchha ho ek deep jalayen.