शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

कितने जगह मनाओगे शहीदी दिवस को ?

चौको न बस सोचो ज़रा ये क्या हो गया

संचित सदा की एकता का साख खो गया

कैसी घड़ी , समय दुखद , मानव संघार का

थी स्वागताकांक्षी धरा दानव चिग्घाड़ का ॥ १॥

घटना न कभी ऐसी स्वतंत्र हिंद में हुई

रो पड़े जिसने भी उस हालत को सुनी

आँखे खुली थी जिनकी वो भी सूर हो गए

कितने लड़े, शहीद, हिंद-ऐ-नूर हो गए ॥ २॥

पर वो रहे डकारते खा खा के पूरियां

पहुंचे न क्षति , बनाए रखे ऐसी दूरियां

जब तक कि बात उठती गोलियां बरस गयी

अपने बिरन को लखने को अखियाँ तरस गयी ॥ ३

फ़िर वो लगे फुदकने कायरों ही की तरंह

अवशेष ढूँढने लगे , आतंक की वजह

कुछ हो तो मिले खैर राजनीती ही सही

कम्युनिस्टों ने कह ही दिया जो कोई ना कही ॥ ४॥

अब तक तो लड़े जान हथेली पे रखके यूँ

मानो न उनका कोई , देश ही है सब कछू

पर देश के गद्दारों नें ये क्या कर दिया

उनके शहीद होने पर , सवाल जड़ दिया ॥ ५॥

ऐसी बनाओ नीति ना कुनीति पर चलो

जिस देश में हो रहते उस देश की कहो

कितने जगंह मनाओगे शहीदी दिवस को

हरेक जगंह रही गर जिंदगी सिसक तो ॥ ६॥

चलेगा न काम धुप , अगर, माल से

आतंक का जवाब दो आतंकी ताल से

हम हैं भला कमजोर वो सहजोर ही कहाँ

भाग जाय सब छोड़ , एक हिलोर हो जहा ॥ ७॥

तबतो मजा है , आनंद इस जलसे जुलूस का

हम स्वाद भी चखा दे दर्दे जूनून का

इक बार गर "सरकार " तूं तैयार हो गया

समझो वतन स्वर्ग का 'घर द्वार ' हो गया

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

कितने जगंह मनाओगे शहीदी दिवस को
हरेक जगंह रही गर जिंदगी सिसक तो ॥ ६॥

सही बात...बढ़िया भावपूर्ण रचना!

उमेश कुमार ने कहा…

kahan hai janab aaplagta hai bhul hi gye sb kuch