शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

गया चला वह शाल पुराना इन नये दिनों की शान बनो

सत्ता पर काबिज पूज्य जनों

फूलो फलो और महान बनो

गया चला वह साल पुराना

इन नये दिनों की शान बनो

क्या हुआ मुम्बई काँप गयी तो

सब सैन्य व्यवस्था हांफ गयी तो

शाशन की गीला गपाली में

दुनिया कमजोरी भांप गयी तो

लथपथ खून से यह धरती

वरण पाप मार्ग को करती

पढ़ते पढ़ते नैतिकता की नियमावली

मानवीयता सारी चिग्घाड़ उठी तो

यह मान चलो तुम बहरे हो

अब हम अनधन की जान बनो ।।

ऐसा भी तुम पहले हमलो में

कुछ और नया क्या करते थे

मरते थे सिपाही गोली खाकर

ख़ुद होटल में बैठ डकारते थे

हाँ , पहुंचते दूसरे देशों में

उबले हुए बेजान आवेशों में

वाद-विवाद कर आतंकवाद पर

झूठी सांत्वना दंगा फसाद पर

अच्छा तुम्हारे एजेंडे में नहीं तो

बुरे कर्तव्यों की पहचान बनो । ।

वर्षांत पर हम करते हैं प्रण

देश की खातिर तन-मन -धन अर्पण

करेगा दुह्साहस गर कभी आतंकी मन

तो जाग उठेगा सारा विश्व संगठन

जगंह जगंह से चीत्कार उठेगा

हिंदुस्तान हुंकार भरेगा

जल उठेगा सारा पाकिस्तान

करते हैं हम फ़िर से आह्वान

पहले आह्वान से देश बटा था

अब विश्व बँटवारे का संधान बनो ।।

बनो बनो कुछ और बनो

इतने से क्या काम चलेगा

उगता सूरज डूबेगा नहीं तो

कैसे नया चाँद निकलेगा

तब तो हिंदू-मुस्लिम जड़ थी

उस पर सबकी गहरी पकड थी

जिधर भी देखो नारे लगे थे

जगंह जगंह हत्यारे खड़े थे

गांधी - शास्त्री तो बन न सकोगे

जिन्नाह - जवाहरलाल बनो

गया चला वह साल पुराना

इन नये दिनों की शान बनो ।।

2 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

ुसंदर लिखा है....काश इतना उत्‍साह और जज्‍बा हमारे नेताओं में भी होता !!!!

उमेश कुमार ने कहा…

kya kahna chahte ho tum. are hamare neta to mej pr bhee har jate hai. tumne dekha nahi hamare neta kaise amerika ke pichhe lage rahte hain. unse aasha nahi karni chahiye. jo kar sakte ho khud karo