रविवार, 8 फ़रवरी 2009

गाँव की हशीन वादियों में बस जीता जा रहा हूँ ....

कहाँ क्या हो रहा घाट रहा क्या राज में

कौन कैसे जी रहा क्या होने वाला समाज में

नहीं पता मुझे कुछ भी सब भूलता जा रहा हूँ

गाँव की हशीन वादियों में बस जीता जा रहा हूँ

सुनता हूँ कुछ घटनाएं , अचरज सा कुछ होता है

जगाता हुआ हृदय फ़िर भी मौन होके सोता है

चिल्लाता है रो ज़माना सुनता जा रहा हूँ

गाँव की हशीन वादियों में बस जीता जा रहा हूँ

है सुख का समुन्दर दुःख कहीं यहाँ पर नहीं

वहीं खड़ी मुशीबत पर है कोई डर नहीं

परसानियां है कुछ परिवारी निपटाता जा रहा हूँ

गाँव की हशीन वादियों में बस जीता जा रहा हूँ

आंटा है, ख़तम चावल , झगडा भाभी नें किया

खाया नहीं भइया , डाटा, भाभी नहीं माता ने रो दिया

छोटी हैं ये समस्यायें पर विश्व से जोड़ता जा रहा हूँ

गाँव की हशीन वादियों में बस जीता जा रहा हूँ ॥

2 टिप्‍पणियां:

विनय ने कहा…

बहुत सार्थक‌

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गुलाबी कोंपलें

उमेश कुमार ने कहा…

Bhav bahut hi achchhe hai. yar in dinon kahan pr ho. tumhara to kuchh pata hi nahi chalta hai.