शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

यदि मनुष्य दीवाल है जिसे कोई हटा नहीं सकता तो भाषा एक नींव है जिसे हटाने के प्रयास में दीवाल को ही जाना है ......

कुछ बातें ऐसी होती हैं जो पास होते हुए भी अपनी उपस्थिति नहीं बतला पाती हैं । पर कुछ तो ऐसी होती हैं जो कहीं पर वर्णित या यों कहें की किसी व्यक्तित्व द्वारा कथित अथवा एक विचारणीय अवस्था में उत्पादित होकर भी हमें और हमारी आत्मीयता को अन्दर तक झकझोर डालती है। इतना ही नहीं ये ऐसी स्थित पर चले जानें के लिए मजबूर कर देती हैं जहाँ पर उस विवेच्य विषय से सम्बंधित चिंतन कराने और एक आवश्यक सोच विकसित करने के अलावा हमारे पास कुछ बचता ही नहीं है हालांकि हम ऐसा नहीं चाहते । ख़ुद को एक ऐसे विषय के प्रति समर्पित करना , जहाँ वह या तो अपने जीवन के अंत पर हो अथवा उसका स्तित्व हाशिये पर हो । पर ऐसे समय में जब वह अपने स्तित्व के लिए , स्वयम मैदान पर आ गया हो तब और खासकर उस समय में जब उसके विरोधी ख़ुद हो रहे हो , समर्पित करना एक सुखद आनंद ही हो सकता है ।

आनंद दुःख की उपस्थिति में ही प्राप्त किया जा सकता है और दुःख प्रायः सुख के अवसान पर । इन दोनों की उत्पत्ति शायद एक दूसरे की उपस्थिति में संभव हो पर द्वंद्व तो तभी होता है जब दोनों आमने सामने हों । एक दूसरे को ललकार रहा हो और दूसरा उसका सामना करनें के लिए उत्प्लावित हो । पर स्थिति तो वही है । भाषा और मानव । दो विरोधी । दोनों ही सामान अवस्था में , एक ही मैदान पर । एक दूसरे के आमने सामने , एक दूसरे पर दूसरा दूसरे पर निर्भर । सोचने का विषय यहाँ पर ये नहीं है , अंग्रेजी फिल्मों की तरंह की मनुष्य मशीनी मानव का निर्माण ख़ुद और स्वयं अपने हाथों से करता है अपने दुश्मनों क सफाया करने के लिए , पर बाद में वही मशीनी मानव सम्पूर्ण इंसानी जाती के लिए खतरा बन जाता है । और अंत में मानव ही उसके स्तित्व को ख़त्म कर स्वयं के स्तित्व को बचाता है ।

और क्योंकि ऐसा समझा जाय की भाषा का निर्माण मनुष्य नें किया , अपने बौद्धिक स्तर को विकसित करने के लिए तो ना ही तो ये वास्तविक है और ना ही तो तर्कसंगत । मनुष्य ने भाषा के ऊपर यदि कोई उपकार किया तो सिर्फ़ वही जो प्रकृति ने मनुष्य के प्रति । यदि कोई ये कही की प्रकृति नें मनुष्य को संवारा तो हम ये दावा के साथ कह सकते है की भाषा ने मनुष्य को एक ऐसा आधार प्रदान किया जिसके माध्यम से मानव और प्रकृति के बीच संवादात्मक व्यवस्था का जन्म हुआ । और ऐसी स्थिति में फ़िल्म HISTORICAL TRUTH को याद किया जाय की मशीनी मनुष्य को ख़त्म करके इंसानी मानव अपने स्तित्व को बचाया तो निश्चय ही अब वह समय दूर नहीं जब , और क्योंकि प्रकृति मानव के हाथों जा रही है और मानव स्तित्वा को भाषा ख़तम कर देगी । क्योंकि भाषा अमर और शाश्वत है । यदि ये कहा जाय की मनुष्य दीवाल है जिसे कोई हटा नहीं सकता तो यह भी सत्य है की भाषा एक नींव है जिसे हटाने के प्रयास में दीवाल को ही जाना है ।

3 टिप्‍पणियां:

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

भाषा बहुत कुछ है अगर हम समझें तो।

रंजना ने कहा…

Sundar saarthak vivechna ki hai aapne......jabtak manushy hai,uski abhivyakti hai to bhasha to rahegi hi.

संगीता पुरी ने कहा…

मनुष्‍य और भाषा की अच्‍छी विवेचना हुई है इस आलेख में।