मंगलवार, 3 मार्च 2009

पर थोड़ा उन विद्यार्थियों को देखो , जो उत्तर प्रदेश के बोर्ड-परीक्षा से जुड़े हुए हैं

वैसे तो मार्च का महीना युवाओं के दिल में एक नया रंग लेकर आता है जिस रंग में उनका मन तो प्रफुल्लित हो ही जाता है , तन भी नवरंगी रंगों से सजकर स्वयं में एक नई धुन का संचार करता है । पर थोड़ा उन विद्यार्थियों को देखो , जो उत्तर प्रदेश के बोर्ड परीक्षा से जुड़े हुए हैं और १० वीं ,१२ वीं की परीक्षा में सामिल हो चुके हैं । पता नहीं क्यों , जो मन खुशी दिखना चाहिए , उत्साहित दिखना चाहिए , प्रसन्न दिखना चाहिए , और चाहिए दिखना एक आश्चर्यचकित कर देने वाली जिज्ञासु भावना से पुलकित , जो वास्तव में इस बात को साबित कर दे की " उछल रही जवानियाँ जवान मस्त जा रहे " या " हम युवा हैं देश के हैं हमारे कल सभी " , पर वे बुझे हुए हैं , टूटे हुए हैं , निरुत्साहित , हीन भावना से ग्रसित , खिन्न हैं , भिन्न हैं , स्वयं की प्रकृति से , चित्त से , माता - पिता के आशान्वित प्रवृत्ति से । इससे एक तरफ़ जहाँ वे लूज , लंगडे , और अपाहिज से लग रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ अब भी जब १७-१८ की उम्र में पहुँच चुके हैं , अबोध बालक की तरंह लग रहे हैं जो इस समय भी इस आशा में है कि कोई आए और हाँथ पकडके लिखाए तो हम लिखें । हम सोंच नहीं सकते , हम हम विचार नहीं कर सकते , और ना ही तो कर सकते हैं प्रयास पेपर में आए हुए प्रश्नों का उत्तर देने के लिए यानि कि " बचपन खेल में खोया " और युवापन कब आया इसका कोई एहसास अब भी नहीं है ।
और फ़िर यह समय तो परीक्षा के रंगों से रंगा दिख रहा है । जिसमें अध्यापक , छात्र , परीक्षा-केन्द्र , साशन-व्यवस्था और तो और अविभावक भी स्वयं में विभिन्न प्रकार के रंगों- से लग रहे हैं जो कहीं कहीं अपने रंगीन माहौल से शिक्षा-समाज में इन रंगों के माध्यम से अराजकता फैला रहे हैं तो कहीं कहीं ऐसा शालीनपूर्ण रंग खेल रहे हैं जहाँ समानता के स्तर पर स्वच्छा-फगुवा का निर्वहन करते दिखाई दे रहे हैं । रंग भी खेल रहे हैं ,लगा भी रहे हैं , लगवा भी रहे हैं । एक का एक दूसरे के प्रति कोई विरोध नहीं । अर्थात शाशन-प्रशाशन , छात्र-अध्यापक अविभावक-विद्यार्थी हित रक्षक ( नकल करवाने वाले दलाल ) सबका सबके प्रति पूर्ण समर्थन भाव । यहाँ ' सर फरोसी की तमन्ना ' भी देखी जा रही है तो 'वसुधैव कुटुम्बकम ' की भावना भी । गार्डों के प्रति ' त्वमेव माता च पिता त्वमेव ' की भावना भी विद्यार्थियों में है तो विद्यार्थियों के प्रति ' साडे नाल रहोगे तो ऐस करोगे ;' की सी यारी । कुलमिलाकर भू -मंडलीकरण और वैश्वीकरण की वास्तविक प्रवृत्ति यहाँ के परीक्षाओं में ही दिख रही है और ऐसी स्थितियां भी यहीं दिख रही हैं , इसी उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षा में विद्यार्थियों को लेकर ' डिप्टी ना कलेक्टर न महाराज बनेगा नक़ल की औलाद है नक़लबाज बनेगा ;' ................. ।

5 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

क्या सही लिखा है मेरे दोस्त

अनिल कान्त : ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Udan Tashtari ने कहा…

सही चित्रण किया है.

seema gupta ने कहा…

इसी उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षा में विद्यार्थियों को लेकर ' डिप्टी ना कलेक्टर न महाराज बनेगा नक़ल की औलाद है नक़लबाज बनेगा ;' ................. ।

" kya bebaki se aapne sach ko ujagr kiya hai...srahniy lekh"

Regards

उमेश कुमार ने कहा…

Exam ka shaya hai
Exam ke samay men
sukh kisne paya hai
ghar wale kahte hai
achchhe nomber lana
jabki yh to moh-maya hai.
paper ka samay aisa hi hota hai dear
3 sal sath rahkar dekh chuka hun.