गुरुवार, 5 मार्च 2009

काश एक बार फ़िर तसलीमा नसरीन किसी नये '' लज्जा '' की रचना का करने में सक्रीय हो जाति .........

खुदा करे कि कयामत हो सब ठीक हो जाए "बडी ही चिंता की बात है , बड़ी ही परेशानी की वजह है , और है बडी ही व्यथित कर देने वाली समस्याएं कि एक तरफ़ जहाँ सम्पूर्ण विश्व आतंक के घेरे में सिमटता जा रहा है वहां आज भी विद् जनों के बीच यह आतंकवाद आलोचना और समालोचना का मुद्दा बना हुआ है , जबकि जरूरत एक त्वरित निर्णय का है । एक ऐसा निर्णय जिसमें सभी एक जुट होकर आतंक के खात्मे का संकल्प लेता दिखाई दे। क्या हिंदू , क्या मुस्लिम , क्या सिख , क्या ईसाई । क्या भारत , क्या अमेरिका , क्या पाकिस्तान , क्या कोरियाई। क्योंकि आज आतंक सिर्फ़ भारत का "झूठा आलाप " नहीं रह गया है जिसे कि संयुक्त राष्ट्र में बार बार उठाये जाने की जरूरत हो , यह तो एक वैश्वीकरण का रूप धारण कर लिया है जो हर जगह , हर मोड़ पर , फ़िर चाहे वह परम्परा या रीति-रिवाज से उपजा कोई त्यौहार हो या मेला अथवा फ़िर क्रिकेट , फिल्मी समारोह , हर स्थान और प्रत्येक प्रक्रियाओं पर अपना आशियाँ बना लिया है आतंकवाद ने ।

भले ही उदयभास्कर के लिये '' भारतीय उपमहाद्वीप के लिए आतंकवाद की व्याधि कोई नई बात नहीं '' है। पर श्रीलंका के लिए ? फ़िर इस्रायल , अमेरिका और स्वयम पाकिस्तान के लिए ?इस्रायल ने तो किया । निःसंकोच किया । उसने सिर्फ़ किया सुना नहीं किसी की क्योंकि whi त्वरित निर्णय था । पर क्या ऐसा भारत , पाकिस्तान और अमेरिका ने भी किया ? और सबसे बडी बात तो यह है कि ;''जब पाकिस्तान सरकार को अपना सारा ध्यान आतंकवादियों की कमर तोड़ने में लगाना चाहिए तब वह उनसे समझौता करने , उन्हें रियायतें देने , और उनमें अच्छा- बुरा का भेद करने में लगी हुई है । '' (दैनिक जागरण सम्पादकीय ) । फ़िर मुंबई हमले में तो पाकिस्तान सरकार और उनके हिमायती लोग भारत से पहेचन मांग रहे थे और इंकार कर रहे थे कि हमलावर उनके देश के निवासी नहीं , पर अब कौन सा साबूत चाहिए उन्हें जब यूनुस खान जैसे प्रभावशाली व्यक्ति सम्पूर्ण पाकिस्तान की तरफ़ से श्री खिलाड़ियों की तरफ़ से माफ़ी मांग रहे हैं ?

ज्यादा तो नहीं , क्यों कि जागरण से लेकर अमर उजाला तक , सभी प्रमुख समाचार पत्रिका ,ने वैसे ही कह दिया है , पर आशा करता हूँ कि काश एक बार फ़िर से तसलीमा नसरीन किसी नये '' लज्जा '' की रचना करने में सक्रिय हो जाती तो शायद उन्हें , कम से कम भारत के विरोध में यह ना कहना होता कि '' भारत कोई विच्छिन्न जम्बूद्वीप नहीं है । भारत में यदि विश-फोडे का जन्म होता है , तो उसका दर्द सिर्फ़ भारत को ही नहीं भोगना पड़ेगा , बल्कि वह दर्द समूची दुनिया में , कम से कम पड़ोसी देशों में तो सबसे पहले फ़ैल जाएगा । '' पर अगर दूसरे नजरिये से देखा जाए तो यह दर्द अभी तक तो सिर्फ़ भारत का था , जिस विष - फोडे का जन्म भारत के नहीं पाकिस्तान के भू-गर्भ से हुआ था । वह घुट रहा था ,वह कुढ़ रहा था ,वह चिल्ला रहा था , रो तो नहीं पर चीत्कार कर रहा था कि यह ( आतंकवाद ) एक महामारी है जिसको मैं ही नहीं तुम सब भोगोगे । पर 'सब ' तो मजे ले रहे थे , इस दर्द का , बेचैनी का और इस पीड़ा का , क्यों कि किसी के आचरण में '' लज्जा '' नहीं नहीं आयी जो इस दर्द का एहसास दूसरे पड़ोसी देशों को भी कराती ।

रही बात आतंकवाद के खात्में के संकल्प का तो मई मानता हूँ कि उदयभास्कर जी को '' आतंकवाद की व्यापक चुनौती के सन्दर्भ में आशा की सुनहरी किरण '' दिखाई दे रही है कि '' पूरा उपमहाद्वीप दहशत के सौदागरों से निपटने के लिए एक जुट हो रहा है '' पर अब भी कुछ तो है जो शायद कह रहा है '' धीरे धीरे बोल कोई धुन ना दे '' क्योंकि डर ही तो आतंक है । और मैं तो कहता हूँ '' खुदा करे कि कयामत हो सब ठीक हो जाए । ''

3 टिप्‍पणियां:

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

और कट्टरपंथियों को काम मिल जाता तलवारें भांजने का।

उमेश कुमार ने कहा…

bhasha ka allahabadikaran shuru ho gya hai. achchha hai.kaise ho. kabhi hal-chal bhee le liya karo

उमेश कुमार ने कहा…

bhasha ka allahabadikaran shuru ho gya hai. achchha hai.kaise ho. kabhi hal-chal bhee le liya karo