शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

वो भी तो जरा तड़पे जो मुझको रुलाती है ...

कोशिश जो किया मैनें अब याद ना वो आए

पर याद को क्या कहेना वो आ ही जाती है

चाहूं जो भुलाना मैं उनको हरदम हरपल

तब याद बराबर क्यूं उनकी ही आती है

हर एक फिजाओं में उनकी ही वफाएं हैं

फरियाद करें क्या हम हमको ही सताती है

एहसान जरा मुझ पर ये याद करो इतना

वो भी तो जरा तड़पे जो मुझको रुलाती है

मौसम की तरंह मैं भी क्या खूब बना सरगम

पर वक्त को क्या कहेना वो दूर ही जाती है ...................

2 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

" very beautifully written liked it"
few of my words on Yaad:

आप की यादों का काफिला,
कुछ इस तरह से,
मेरे साथ चलता है,
" की"
आप से हर रोज
मुलाकात हो जाती है

Regards

उमेश कुमार ने कहा…

इन यादों के संसार में यादें ही आती है, हम भूलने के बहने ही याद कर लेतें है।आप मुझे भुलाने की कोशिश करते रहो, कम से कम इसी बहने मुझे याद करते रहो।