रविवार, 31 अगस्त 2008

जीता आया जीवन क्या जीनें के लिए ही ............

पूछता हूँ कभी कभी आत्मीयता से उठकर

ज्यों छोटा बच्चा पूछता है बड़ों से हुडुककर

क्या जीवन बना है बस जीने के लिए ही

जीता आया जीवन क्या जीनें के लिए ही

रख उम्मीदे फ़िर दिल में सोचता हूँ मैं

अभी तो दिन बहुत से हैं सवरने के लिए

छोटा था , चलना , पढ़ना ,सीखा समझना किसी को

बीत जायेगी उम्र यूँ , क्या सीखनें के लिए ही ........ ।

3 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत सुंदर शब्द और अर्थ पूर्ण रचना....बधाई
नीरज

mohit mittal ने कहा…

hello sir i have been following ur work for along time. but today only got a chance to comment. it's a great poem. it's true that most of the people live and ultimately die without even realising what their lives were meant for. there is a purpose in everybody's life. realising and fulfilling that are two separate things. bhagwadgeeta too inspires us to do our duty and make our lives worthy enough.

उमेश कुमार ने कहा…

प्यारे अनिल दिन तो बहुत हैं लेकिन मै मनाता हूँ की दिन से ज्यादा काम हैं। इसलिए यह मेट सोचो की बहुत दिन हैं अज्ज से ही एक-एक पल का सदुपयोग करना शुरू कर दो। मैंने आपको बताया था की "यह समय नही है सोने का एक भी पल खोने का " कबीर दास ने भी कहा था की " कल करे सो आज कर आज करे सो अब, पल में परैल्ये होयगी बहुर करोगे कब। लेकिन ठीक है जब से चेता टीबी से सही, कुछ तो होते हैं तो मरने तक नही कहते हैं। अच्छी कविता है।
धन्यवाद, उमेश कुमार