रविवार, 31 अगस्त 2008

यदि पत्ते ना होते तो ऐसा कुछ भी ना होता......ये जड़ भी काट दिए गए होते .....(पत्र )

पूज्यनीय ,

माता जी सादर चरण छू प्रणाम । कैसी हो ? मैं तो खुश हूँ इसी से आपके लिए भी आशा करता हूँ की खुश ही होंगी । पर क्या आपको पता है कि दुःख और विपदा ये दोनों ही उस खुशी के एक अभिन्न अंग हैं । जिस खुशी में हम जी रहे हैं । आप जी रही हैं । और और लोग जी रहे हैं । संसार जी रहा है । कोई ऊंचे पद पर है तो जी रहा है कोई सड़कों पर टहल रहा है तो भी जी रहा है । सिर्फ़ जी रहा है । उठा रहा है आनंद । मानव जीवन का नहीं बल्कि इस बात का कि जीवन एक संघर्ष है । संघर्ष ही जीवन है । इसमें से किसी एक की भी भागीदारी ना मात्र होनें से मानव जीवन जीवन नहीं रह जाता वह पशुतर हो जाता है ।

माता जी ! वहाँ पर ना तो शायद इतनी जोर हवा चल रही होगी और ना ही तो इतनी ठंडी होगी , पर यहाँ पर आर हवा तेज चल रही है । बहुत तेज । वह रह रह कर कुछ कह रही है । शायद वह मुझे भी ले जाना चाहती है अपनें साथ ; पर कहाँ ? ये नही पता । आपके पास । आपके चरणों में । या इन सब से बहुत दूर । आज मन बहुत घबडा रहा है इन हवा के झोकाओं से । जिस तरंह से ये पत्ते आपस में लड़ कर एक दूसरे के विरुद्ध द्वंद्व का संदेश दे रहे हैं , एक दूसरे के विरोध में फडफड़ा रहे हैं , उसी तरंह से मेरे मन की अंतर्क्रिया भी फडफडा रही है । फ़िर इन पत्तों को देखो ! कितने मजबूर हैं बेचारे । फडफड़ा रहे हैं । कलह झेल रहे हैं । पर ना तो कहीं जा रहे हैं और ना ही तो कुछ कर पा रहे हैं । सामर्थ्य है । शक्ति है । क्षमता है । पर शायद ये इसलिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं कि क्योंकि ये अबभी उस पेड़ के आसरे है जो खड़ा होकर इनको एक आधार दिया है फड़फड़ाने के लिए । एक सहारा दिया है झूमनें के लिए । पर एक सहारा ही तो दिया है ? मैं मानता हूँ कि इसके सहारा देनें से वह हर है आज मुस्कुरा रहा है । खा खाकर झूम रहा है । उधर से इधर इधर से उधर एक दूसरे का संदेसा पहुँचा रहा है । पर यदि आज ये पत्ता ना होता तो क्या इस जड़ का अपना कोई स्तित्व था ? क्या इस जड़ को लोग ऐसे ही खड़ा रहने देते ? या फ़िर ये कि इसके आरी बगल लोग आकर बैठते , जिस तरंह से गर्मियों के मौसम में लोग आया करते हैं ? बैठा करते हैं । बातें करते हैं ? यदि पत्ते ना होते तो ऐसा कुछ न होता , बल्कि अब तक ये जड़ भी काट दिए गए होते । या तो इनका उपयोग चूल्हे और भट्ठियों में हो जाता या तो फ़िर कोई कीवाड़ या खिड़की वगैरह के रूप में परिवर्तित हो गया होता ।

आख़िर जीवन क्या है ? दो दिलों की अभिव्यक्ति ही तो है ना ? क्या बगैर दो के कोई किसी का जीवन संभव है क्या ? यदि ऐसा होता ही तो क्यों फ़िर होते ये रिश्ते नाते और क्यों होता ये समाज । फ़िर तो ये धरती ये मृत्यु लोक , जहाँ पर आनें के लिए देवता लोग भी तरसा करते हैं , जिसकी समरसता और संबंधता को चरों युगों में सर्वश्रेष्ठ और महान समझ गया यों ही नष्ट हो कर रह जाती ना तो किसी के कर्तव्य होते ना ही तो किसी के अधिकार । ......

1 टिप्पणी:

उमेश कुमार ने कहा…

bahut achchha likha hai apne. patte hi ped ki pahchan hote hain. agar patte3 hi nahi hoge to ped ka koi mahtav hi nahi ho sakta hai. lekin mere dost, tum shayad bhool rahe ho ki patte kabhee-kabhee ped ko gira bhee dete hai. agar aaj ke samaj pr najar dala jaya to yh saf najar ata hai. log yuva hone pr us ped ko hi alag kr dete hai jisne use banaya hota hai. shayad aap samjh raHE HAIN